प्रेम बनाम शक्ति

गलती से मैं आमावस्या के दिन बाज़ार चली गई. दूकानदार बोला आज सिर्फ पूजा का सामान ही मिलेगा. आप कल परसों आइए.” खाली हाथ लौटना पड़ा. चारों ओर नवरात्र की धूम मची है. इन नौ दिनों तक लोग व्रत रखते हैं तन और मन की शुद्धि के लिये. देवी माँ और कन्या की पूजा भी करते हैं. पर वास्तव में क्या ऐसे आयोजनों से मन शुद्ध हो पाता है? स्त्रियों के प्रति मानसिकता बदलती है? मैंने तो कभी भी अपने आस पास किसी को नवरात्र पूजा के कारण बदलते नहीं देखा.लोग किसी तरह कर्म कांड निपटा कर काम पर भागते हैं. तन मन शुद्ध हुआ या नहीं, यह सोंचने की किसी को न तो फुरसत है और न कोई जानना चाहता है.

सच्ची पूजा क्या होती है ? समझने की एक कोशिश की है मैंने और नमन करती हूँ उस पुजारी को

मेरी दृष्टि में पुरुष वही है
जो परम्पराओं को तोड़ दे
खिंची हुई लकीरों पर तो सब चलते हैं
रास्ता आसान जो होता है
पुरुष वही जो अपनी राह स्वयं बनाए
अपने अनवरत प्रयास से
दशरथ माँझी बन कर
पर अपनी राह कौन बना सकता है?
जिसके अंतर में प्रेम हो
जिसने प्रेम न किया हो
शक्ति उसके पास कैसे आ सकती है?
प्रेम को मैं शक्ति का पर्याय मानती हूँ
प्रेम को नकारना
क्या शक्ति को नकारना नहीं?
सृष्टि का संचालन भी
प्रेम के बिना संभव न हुआ
तभी तो विधाता को
शक्ति की रचना करनी पड़ी.