नारी सुरक्षा

कहते हैं स्त्रियों के लिए
विवाह सामाजिक सुरक्षा की ढाल है.
पर मुझे लगता है
स्त्री को जाल में फंसाने की एक चाल है.
जनक ने सीता का हाथ दे दिया
उस युग के सर्वश्रेष्ठ वीर को
पर एक नहीं दो दो वीर रघुवंशी भी
उसकी रक्षा कर पाए?
द्रौपदी ने तो एक नहीं,
पाँच पाँच ब्याह रचाए
पर वे भी काम न आए
उसकी लाज बचाने तो
स्वयं भगवान दौड़े दौड़े आए.
पति को सुरक्षा की गारंटी मान लेना
कहाँ तक सही है?
सबका रखवाला ऊपररवाला है
स्त्रियों के लिये भी
क्या यही बात सही नहीं है?
और यदि सुरक्षा देने वाला ही
अत्याचारी बन जाए
बलात्कारी बन जाए
तब क्या स्त्री फूलन न बन जाए?
स्वयं शक्ति न बन जाए?

 

एक प्रश्न

क्या है पवित्रता अपवित्रता की परिभाषा?
समझ नहीं पाती मैं
यह प्रश्न तो सृष्टि के प्रारम्भ से ही है
कभी सीता ने पूछा, बाद में द्रौपदी ने
और निर्भया पूछती रही अंतिम साँस तक
पुरुष कितना भी जघन्य अपराध करे
सदा पवित्र ही रहता है . क्यों?
किसने दिया उसे पवित्रता का यह सर्टिफिकेट?
नारी पवित्र है जब तक अनछुई है
उसे छू कर अपवित्र करने वाला तो पुरुष ही है.
अगर पुरुष पवित्र है तो उसका स्पर्श पाकर
नारी की पवित्रता दुगुनी हो जानी चाहिए
पारस के स्पर्श से लोहा सोना बनेगा
अपवित्र थोडे ही होगा
सदा से ही अनुत्तरित है यह प्रश्न
क्या इसका उत्तर कोई दे पाएगा?
कल जब गुडिया बडी हो जाएगी
तब क्या वह भी न पूछेगी यही प्रश्न?
मुझ अबोध को अपवित्र करने वाला
पवित्र क्यों कहलाता है?
कितने भी कानून बना लो
एकाध को फाँसी पर चढा दो तो भी क्या
पवित्रता की यह परिभाषा बदल पाएगी?

अवतार

हे परमेश्वर !
दुष्टों का नाश करने तुम त्रेता युग में आए
रावण का वध किया, सीता की रक्षा की
द्वापर में तुम पुनः अवतरित हुए
द्रौपदी की लाज बचाई, दुर्योधन दुःशासन का अंत हुआ
एक बार पुनः धर्म की स्थापना हुई.
पर मेरा कहा मानो तो कलयुग में मत आना
तुम कहोगे ईश्वर को परामर्श दे रही हो?
मुझे परामर्श देने वाली तुम हो कौन?
हे अर्धनारीश्वर मैं तुम्हारी अर्धांगिनी
तुम्हारी शुभाकांक्षिणी , वामांगी तुम्हारी
मैं शक्ति हूँ प्रभु , तुम्हारी अपनी शक्ति
तुम्हारी अपनी ही कार्येषु मंत्री हूँ
और परामर्श नहीं विनती है भगवन !
क्योंकि इस बार आए तो किस किस को मारोगे?
दुष्टों का दमन करते करते कहीं तुम्हारी सृष्टि ही समाप्त न हो जाए.

महानगर जीवन पीते हैं.

हमने-तुमने मिल-मिल करके
महानगर हैं कई बसाए.
भौतिक सुख़ सुविधा पाने को
गाँवों से चल-चल कर आए –
आँखों में कुछ स्वप्न सजाए.
टूट जाएं तो टूटे सपने फिर सींते हैं
महानगर जीवन पीते हैं.

मात-पिता भी दर्द न जाने
बेटा ‘सुख की कुंजी’ मानें
नोट गिन रहा सब परिवार
पैसा पहले पीछे प्यार
सबकी चाहत पूरी करते
बिना कहे सब कुछ सहते है
जानबूझ कर मजबूरी में
पल-पल सस्ते में बिकते हैं
महानगर जीवन पीते हैं.

खाना कम मेहनत ज्यादा है
फिर भी ना सुख़ का वादा है
सोलह घंटे काम करो पर
मालिक को ये कम लगते हैं
धुँआ-धूल आँखों में भर कर
सेहत की आहुति देते हैं.
यद्यपि सब तिल-तिल मरते हैं
फिर भी सब तिल-तिल जीते हैं
महानगर जीवन पीते हैं.

आसमान  का  दर्द

बचपन में मैं घंटों आसमान को निहारा करती. अच्छा लगता था. कितना सुंदर लगता था क्या बताऊँ. चौबीस अलग – अलग घंटों का अलग – अलग आसमान – कभी चाँद – तारों भरा आसमान, कभी इंद्रधनुष से सजा आसमान. अब तो इंद्रधनुष भी रूठ गया है. कौन बाहर आए भला इस प्रदूषण में – जहाँ दम घुटता हो. बादलों से बने अनगिनत आकृतियाँ देखती थी नीले आसमान में. यूं समझिए कि हमेशा से ही दोस्ती थी मेरी आसमान से. कितने यादगार सुंदर पल साथ बिताए हैं हमने.
पर अब आसमान को देखती हूँ तो मन उदास हो जाता है. आसमान है तो मगर लगता है मानो किसी ने उसकी सुंदरता छीन ली है. कभी सोंचा भी न था मेरा प्यारा दोस्त बूढ़ा और बीमार हो जाएगा.
आसमान तुम बिछड़ गए क्यों ?
बरसों बीते नहीं मिले तुम
कितना ढूँढा नहीं मिले तुम
तुमको ढूंढे किसे पड़ी है ?
मेरी आस अभी न मरी है

कभी मिलोगे ढूढूगी गर
फिर मत खोना कहती हूँ पर
साथ हमारा बड़ा पुराना
गुज़रा मानो एक ज़माना
कभी – कभी देखा है तुमको
पर लगते हो तुम बीमार
कहो तुम्हे क्या रोग लगा है
लगा कहो क्या तुम्हें बुखार?

नीली – नीली त्वचा तुम्हारी
बोलो क्यों है धूमिल लगती?
चंदा – सूरज तो आते हैं
तारों की महफ़िल ना सजती

इतने क्रूर हुए क्यों मानव
करते तुम पर अत्याचार.
मनमानी कर तुम्हे सताते
कर्म करें क्यों बिना विचार.

दर्द तुम्हारा कोई न जाने
करते रहते दुर्व्यवहार
पर मैं समझूं दर्द तुम्हारा
बातें कभी करो दो – चार.

त्योहार

नवरात्र बीत गए – दशहरा मना कर. दीपावली आने को है. पर कोई नहीं सोंचता कि हम त्योहार मनाते क्यों हैं? दशहरा पर रावण का पुतला जलाने की परम्परा है.पहले पूरे शहर में एकाध पुतले जला दिए जाते थे.आज पुतलों की संख्या बढ़ती जा रही है.जिस घर में मैं रहती हूँ, उसकी खिड़कियाँ खोलो तो सामने एक सुंदर पार्क है.पिछले बीस वर्षों में यहाँ पर दशहरे के दिन कोई गतिविधि नहीं हुई.
दरअसल काफी दिनों बाद मौसम कुछ सुहावना हुआ है.उस रोज़ संध्या समय मैं खिड़की खोल कर प्राणयाम कर रही थी – आनंदपूर्वक. तभी लगा पास में ही कही बम फट रहे हैं.उठी और खिड़की से झांका तो क्या देखा कि सामने वाले पार्क में ही एक नहीं, दो – दो पुतले खड़े थे.उन्हीं में से एक जल रहा था.इसके पहले कि धुंआ ऊपर मेरी खिड़की तक आता, मैंने खिड़की बंद कर दी. परदे भी तान दिये.फिर भी कुछ ही पलों में सारा घर धुंआ – धुंआ हो गया. पटाखों की तेज़ गंध भी सब ओर फैल गई.सोंचा नीचे जा कर लोगों को समझाऊं, पर बम – पटाखों के शोर से कान फटे जा रहे थे – हिम्मत ही न हुई.अब यह कहने की आवश्यकता नहीं समझती कि इस प्रदूषण से एकमात्र मुझे ही परेशानी हुई.रिहायशी इलाकों में ऐसा करना ठीक है क्या?
इस बुराई के प्रतीक पुतले को जला कर बुराइयां कम होती हैं,इस बात पर मुझे संदेह है.पर प्रदूषण अवश्य बढ़ता है – इसमें कोई संदेह नहीं.सब को मालूम है कि त्योहारों प्रदूषण रहित तरीके से कैसे मनाया जा सकता है. आशा है लोग समझेंगे और दीवाली को केवल दीपमालिका के रूप में मनायेंगे.
शुभकामनाएं.
त्योहार डराते हैं…….

त्योहारों का मौसम है.पर अब मुझे त्योहारों की प्रतीक्षा नहीं रहती. प्रदूषण तो एक समस्या है ही, एक और विकट समस्या आ खड़ी होती है – प्रभु को अर्पण क्या करूँ? शबरी बन कर बेर चख भी लूँ तो कीटनाशकों का क्या?
ईश्वर ने सृष्टि बनाई –
प्रकृति के रूप में इसे सजाई.
जीवन दिया तो जीवनदायिनी –
जल, वायु, भोजन, औषधि….
हर वस्तु सुलभ कराई.
सत – असत, अच्छाई – बुराई
हर तत्व में दो अतियां बनाईं.
उसे लगा था –
मानव को बुद्धि भी दी है
वह अवश्य ही ‘सही’ चुनेगा.
इस सुंदर धरती को
और भी सुंदर करेगा.
पर मानव ने क्या किया —
बुद्धि पाकर भी –
मानस में दुर्बुद्धि को पाला
हर सुंदर को असुंदर कर डाला.
पानी पियो तो क्लोरीन की बास आती है,
साँस लो तो साँस उखड़ – उखड़ जाती है.
खाद्य पदार्थों में ज़हर घुला है
दूध भी अब कहाँ दूध का धुला है?
जब बचपन ही है बीमार,
तो क्या पूछो बुढ़ापे का हाल?
कुछ भी खाएं, कितना भी कमाएं,
बस दवाओं का ही बोझ बढ़ता जाए
ऐसे में त्योहार कोई क्या मनाए?

सावधान !
दवा दारू भी अब कहाँ ‘सेफ’ हैं –
बाज़ार में बिकने वाली
कई दवाएं भी ‘फेक’ हैं.

बेटी बचाओ…

कन्या भ्रूण हत्या का विचार
मुझे झकझोर देता है,
चीर देता है अंदर तक
मेरी यह कृति, यह रचना –
कविता नहीं, क्रंदन है –
एक करुण क्रंदन !
उन अजन्मी आत्माओं के लिये –
जो कोख में ही उजड़ गईं
और पैदा हो भी गईं तो
माँ की गोद न मिली
फेंक दी गईं किसी कचरेदान में.
यह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा
कितना खोखला है
यदि बेटी को बचा भी लिया
तो क्या गारंटी कि आगे भी बच पायेगी?
कोई बलात्कारी आ कर बलात्कार करेगा
या फिर दहेज की अग्नि जलायेगी
क्या पता कोई एसिड ही डाल दे?
या हार कर खुद ही भस्म हो जायेगी.