आसमान  का  दर्द

बचपन में मैं घंटों आसमान को निहारा करती. अच्छा लगता था. कितना सुंदर लगता था क्या बताऊँ. चौबीस अलग – अलग घंटों का अलग – अलग आसमान – कभी चाँद – तारों भरा आसमान, कभी इंद्रधनुष से सजा आसमान. अब तो इंद्रधनुष भी रूठ गया है. कौन बाहर आए भला इस प्रदूषण में – जहाँ दम घुटता हो. बादलों से बने अनगिनत आकृतियाँ देखती थी नीले आसमान में. यूं समझिए कि हमेशा से ही दोस्ती थी मेरी आसमान से. कितने यादगार सुंदर पल साथ बिताए हैं हमने.
पर अब आसमान को देखती हूँ तो मन उदास हो जाता है. आसमान है तो मगर लगता है मानो किसी ने उसकी सुंदरता छीन ली है. कभी सोंचा भी न था मेरा प्यारा दोस्त बूढ़ा और बीमार हो जाएगा.
आसमान तुम बिछड़ गए क्यों ?
बरसों बीते नहीं मिले तुम
कितना ढूँढा नहीं मिले तुम
तुमको ढूंढे किसे पड़ी है ?
मेरी आस अभी न मरी है

कभी मिलोगे ढूढूगी गर
फिर मत खोना कहती हूँ पर
साथ हमारा बड़ा पुराना
गुज़रा मानो एक ज़माना
कभी – कभी देखा है तुमको
पर लगते हो तुम बीमार
कहो तुम्हे क्या रोग लगा है
लगा कहो क्या तुम्हें बुखार?

नीली – नीली त्वचा तुम्हारी
बोलो क्यों है धूमिल लगती?
चंदा – सूरज तो आते हैं
तारों की महफ़िल ना सजती

इतने क्रूर हुए क्यों मानव
करते तुम पर अत्याचार.
मनमानी कर तुम्हे सताते
कर्म करें क्यों बिना विचार.

दर्द तुम्हारा कोई न जाने
करते रहते दुर्व्यवहार
पर मैं समझूं दर्द तुम्हारा
बातें कभी करो दो – चार.

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