त्योहार

नवरात्र बीत गए – दशहरा मना कर. दीपावली आने को है. पर कोई नहीं सोंचता कि हम त्योहार मनाते क्यों हैं? दशहरा पर रावण का पुतला जलाने की परम्परा है.पहले पूरे शहर में एकाध पुतले जला दिए जाते थे.आज पुतलों की संख्या बढ़ती जा रही है.जिस घर में मैं रहती हूँ, उसकी खिड़कियाँ खोलो तो सामने एक सुंदर पार्क है.पिछले बीस वर्षों में यहाँ पर दशहरे के दिन कोई गतिविधि नहीं हुई.
दरअसल काफी दिनों बाद मौसम कुछ सुहावना हुआ है.उस रोज़ संध्या समय मैं खिड़की खोल कर प्राणयाम कर रही थी – आनंदपूर्वक. तभी लगा पास में ही कही बम फट रहे हैं.उठी और खिड़की से झांका तो क्या देखा कि सामने वाले पार्क में ही एक नहीं, दो – दो पुतले खड़े थे.उन्हीं में से एक जल रहा था.इसके पहले कि धुंआ ऊपर मेरी खिड़की तक आता, मैंने खिड़की बंद कर दी. परदे भी तान दिये.फिर भी कुछ ही पलों में सारा घर धुंआ – धुंआ हो गया. पटाखों की तेज़ गंध भी सब ओर फैल गई.सोंचा नीचे जा कर लोगों को समझाऊं, पर बम – पटाखों के शोर से कान फटे जा रहे थे – हिम्मत ही न हुई.अब यह कहने की आवश्यकता नहीं समझती कि इस प्रदूषण से एकमात्र मुझे ही परेशानी हुई.रिहायशी इलाकों में ऐसा करना ठीक है क्या?
इस बुराई के प्रतीक पुतले को जला कर बुराइयां कम होती हैं,इस बात पर मुझे संदेह है.पर प्रदूषण अवश्य बढ़ता है – इसमें कोई संदेह नहीं.सब को मालूम है कि त्योहारों प्रदूषण रहित तरीके से कैसे मनाया जा सकता है. आशा है लोग समझेंगे और दीवाली को केवल दीपमालिका के रूप में मनायेंगे.
शुभकामनाएं.
त्योहार डराते हैं…….

त्योहारों का मौसम है.पर अब मुझे त्योहारों की प्रतीक्षा नहीं रहती. प्रदूषण तो एक समस्या है ही, एक और विकट समस्या आ खड़ी होती है – प्रभु को अर्पण क्या करूँ? शबरी बन कर बेर चख भी लूँ तो कीटनाशकों का क्या?
ईश्वर ने सृष्टि बनाई –
प्रकृति के रूप में इसे सजाई.
जीवन दिया तो जीवनदायिनी –
जल, वायु, भोजन, औषधि….
हर वस्तु सुलभ कराई.
सत – असत, अच्छाई – बुराई
हर तत्व में दो अतियां बनाईं.
उसे लगा था –
मानव को बुद्धि भी दी है
वह अवश्य ही ‘सही’ चुनेगा.
इस सुंदर धरती को
और भी सुंदर करेगा.
पर मानव ने क्या किया —
बुद्धि पाकर भी –
मानस में दुर्बुद्धि को पाला
हर सुंदर को असुंदर कर डाला.
पानी पियो तो क्लोरीन की बास आती है,
साँस लो तो साँस उखड़ – उखड़ जाती है.
खाद्य पदार्थों में ज़हर घुला है
दूध भी अब कहाँ दूध का धुला है?
जब बचपन ही है बीमार,
तो क्या पूछो बुढ़ापे का हाल?
कुछ भी खाएं, कितना भी कमाएं,
बस दवाओं का ही बोझ बढ़ता जाए
ऐसे में त्योहार कोई क्या मनाए?

सावधान !
दवा दारू भी अब कहाँ ‘सेफ’ हैं –
बाज़ार में बिकने वाली
कई दवाएं भी ‘फेक’ हैं.

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2 thoughts on “त्योहार

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